03/12/2020
#प्रेमी_और_पुरुष..
समानता तो बिल्कुल नहीं
ऐसा नहीं कि दोनों एक नहीं
लेकिन एक होते हुए भी
दोनों बहुत अलग हैं,
अंतर पुरुष और प्रेमी का
कि दोनों होकर भी एक नहीं
प्रेम का होना अलग कर देता है
जो जोड़ता था कभी उन्हें,
पुरुष प्रेम में होता है जब
तो पुरुष नहीं होता बल्कि
वो हो जाता है प्रेमी
पुरुष की पशुता से दूर बहुत,
प्रेम के समीप होकर वो
समझता है प्रेम का ककहरा
जो वो समझ नहीं पाया था
पुरुष होने के दंभ में कभी,
'प्रेम में होना' और 'प्रेमी हो जाना'
ये दोनों भी अलग से हैं बहुत
अंतर पौरुष और दंभ भर है
जो प्रेम में होने में नहीं कतई,
प्रेम करने का मुग़ालता और
प्रेम में हो जाने की हक़ीक़त
हर कोई समझ भी नहीं पाता
कि थोड़ा कठिन है समझना,
प्रेम के लायक हो जाना
ऐसा है जैसे बहता पानी हो
निश्छल, निर्मल और सरल
पौरुष और दंभ कहीं नहीं,
हर पुरुष प्रेम में हो सकता है
पर प्रेमी होना इतना सरल नहीं
तभी प्रेमी हो जाने का मुग़ालता
पाले रहने वाले प्रेमी नहीं हो पाते,
प्रेमी हो जाने का समर्पण हो
अपने पौरुष से दूर बहुत दूर
समर्पण एक स्त्री के लिए
कुछेक पुरुष ही हो पाते हैं,
हज़ारों-लाख़ों प्रेम में पड़े
पुरुषों से कुछ ही होते हैं जो
प्रेमी होने की परीक्षा में उतरते हैं
और हो पाते हैं समर्पित प्रेमी,
स्त्री समझ पाती है अंतर
दंभ-रहित निश्छल प्रेम
और पौरुष-मिश्रित प्रेम का
उसके लिए आसान है जान लेना,
मन से चाह सकती है बस
जो प्रेमी हो गया हो उसे
उसे नहीं जो प्रेम में हो
स्त्री के लिए अहम है बहुत,
हालाँकि स्त्री पड़ जाती है
प्रेम जताने वाले के प्रेम में
लेकिन समझती भी है मिथ्या को
कि अक्सर विकल्प होते नहीं,
अंतर मीलों का सा है ये
पुरुष और प्रेमी हो जाने का
पुरुष प्रेम में बेहतर तो हो जाते हैं
लेकिन कुछ ही 'प्रेमी' हो पाते हैं. ❤️