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शादी में शगुन प्रथा : एक सामाजिक असमानता की जड़भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मि...
28/05/2026

शादी में शगुन प्रथा : एक सामाजिक असमानता की जड़
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। हमारी संस्कृति में शादी-ब्याह के अवसर पर रिश्तेदारों और परिचितों द्वारा “शगुन” देने की परंपरा बहुत पुरानी है। मूल रूप से इसका उद्देश्य नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद और सहयोग देना था। लेकिन समय के साथ यह परंपरा अपनी मर्यादा और उद्देश्य से भटक गई। आज शगुन प्रेम और शुभकामना से अधिक दिखावे, सामाजिक दबाव और आर्थिक बोझ का माध्यम बन चुकी है। इसलिए अब समय आ गया है कि इस प्रथा पर गंभीर विचार किया जाए और इसे समाप्त अथवा पूरी तरह समानता आधारित बनाया जाए।
पहले के समय में लोग सामर्थ्य अनुसार थोड़ा-बहुत अनाज, कपड़ा या धन देकर सहायता करते थे। उसमें न कोई प्रतिस्पर्धा थी और न ही अहंकार। लेकिन आज शगुन एक प्रकार का “लेन-देन का हिसाब” बन गया है। लोग यह देखने लगे हैं कि किसने कितने रुपये दिए, किसने कम दिए और किसने ज्यादा। कई परिवार तो बाकायदा डायरी में लिखते हैं कि किस व्यक्ति ने कितना शगुन दिया ताकि भविष्य में उतना ही लौटाया जा सके। इस सोच ने रिश्तों की आत्मीयता को कमजोर कर दिया है।
इस प्रथा का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित होती है, वे शादी का निमंत्रण मिलने पर खुशी से अधिक चिंता महसूस करते हैं। वे सोचने लगते हैं कि “अगर कम शगुन दिया तो लोग क्या कहेंगे?” इसी कारण कई लोग शादी में जाने से कतराते हैं। कुछ लोग उधार लेकर या अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके शगुन देते हैं ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। यह स्थिति अत्यंत दुखद है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी मजदूर या छोटे कर्मचारी को एक महीने में तीन-चार शादियों का निमंत्रण मिल जाता है। उसका मासिक वेतन मुश्किल से घर चलाने लायक होता है, फिर भी उसे प्रत्येक शादी में हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यदि वह कम राशि देता है तो उसे शर्मिंदगी महसूस होती है। दूसरी ओर, संपन्न लोग बड़े-बड़े शगुन देकर अपने धन का प्रदर्शन करते हैं और कहीं न कहीं उनके भीतर घमंड की भावना भी उत्पन्न होती है। इस प्रकार शगुन की परंपरा सामाजिक असमानता और मानसिक दबाव को बढ़ाती है।
शगुन प्रथा का एक और नकारात्मक पक्ष यह है कि इससे रिश्तों में स्वार्थ प्रवेश कर जाता है। कई बार लोग निमंत्रण इस भावना से देते हैं कि “उन्होंने हमारे यहाँ इतना दिया था, इसलिए इन्हें बुलाना जरूरी है।” रिश्ते प्रेम और अपनत्व के बजाय पैसों के आदान-प्रदान तक सीमित होने लगते हैं। विवाह जैसे पवित्र संस्कार का उद्देश्य आनंद और आशीर्वाद होना चाहिए, न कि आर्थिक तुलना।
समाज में समरसता बनाए रखने के लिए इस प्रथा को समाप्त करना अत्यंत आवश्यक है। विवाह में केवल आशीर्वाद और शुभकामनाओं को महत्व मिलना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से सहयोग करना भी चाहता है, तो वह बिना दिखावे और बिना सामाजिक दबाव के करे। सबसे अच्छा उपाय यह हो सकता है कि शादी में शगुन लेने-देने की परंपरा पूरी तरह बंद कर दी जाए। यदि समाज इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, तो कम से कम एक समान प्रतीकात्मक शगुन की व्यवस्था होनी चाहिए, जैसे सभी लोग केवल 11 रुपये, 21 रुपये या एक फूल देकर आशीर्वाद दें। इससे अमीर और गरीब के बीच भेदभाव समाप्त होगा और किसी को शर्मिंदगी महसूस नहीं होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं को आँख बंद करके न अपनाएँ, बल्कि यह देखें कि वे समाज के लिए उपयोगी हैं या हानिकारक। जो परंपरा लोगों में हीन भावना, दिखावा, घमंड और आर्थिक बोझ पैदा करे, उसे बदल देना ही उचित है। सच्चे रिश्ते पैसों से नहीं, बल्कि सम्मान, प्रेम और सहयोग से मजबूत होते हैं।
अंततः यही कहा जा सकता है कि शादी में शगुन की वर्तमान प्रथा समाज में असमानता और मानसिक दबाव को बढ़ावा देती है। इसलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए या फिर पूरी तरह समानता आधारित बना देना चाहिए ताकि हर व्यक्ति बिना डर, शर्म और दबाव के विवाह समारोह में सम्मिलित हो सके और समाज में वास्तविक समरसता स्थापित हो सके।

साभार
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25/05/2026

Color of life.
Can u choose ?

“नर के साथ सुवा हरि बोले, हरि प्रताप न जाने।”यह पंक्ति अत्यंत गहरे आध्यात्मिक और जीवन-संबंधी सत्य को प्रकट करती है।इसका ...
20/05/2026

“नर के साथ सुवा हरि बोले, हरि प्रताप न जाने।”

यह पंक्ति अत्यंत गहरे आध्यात्मिक और जीवन-संबंधी सत्य को प्रकट करती है।
इसका अर्थ केवल इतना नहीं है कि कोई तोता भगवान का नाम बोल रहा है,
बल्कि यह मनुष्य के भीतर ज्ञान और अनुभूति के अंतर को समझाती है।
सरल अर्थ
“सुवा” अर्थात तोता।
तोता अक्सर “राम-राम”, “हरि-हरि” जैसे शब्द बोल लेता है,
लेकिन उसे उन शब्दों का वास्तविक अर्थ, महिमा और दिव्यता ज्ञात नहीं होती।
उसी प्रकार कई मनुष्य भी भगवान का नाम तो लेते हैं,
भजन, पूजा, कथा और मंत्र भी करते हैं,
लेकिन उनके भीतर सच्ची भक्ति, प्रेम, आचरण और ईश्वर का अनुभव नहीं होता।
अर्थात —
केवल शब्द बोलना ही पर्याप्त नहीं है,
बल्कि उनके भाव और सत्य को समझना आवश्यक है।
गहरी व्याख्या
यह पंक्ति मानव जीवन की एक बहुत बड़ी वास्तविकता को उजागर करती है।
आज संसार में अनेक लोग धर्म की बातें करते हैं,
शास्त्रों का ज्ञान दिखाते हैं,
माला फेरते हैं, प्रवचन सुनते हैं और ईश्वर का नाम भी बार-बार लेते हैं।
लेकिन यदि उनके व्यवहार में दया, विनम्रता, सत्य, प्रेम और करुणा नहीं है,
तो वह केवल तोते की तरह शब्द दोहरा रहे हैं।
जिस प्रकार तोता “हरि” बोलता है,
लेकिन उसे भगवान के नाम की शक्ति का अनुभव नहीं होता,
उसी प्रकार केवल मुख से भक्ति करने वाला व्यक्ति भी ईश्वर के वास्तविक प्रताप को नहीं जान पाता।
केवल शब्द नहीं, भाव आवश्यक है
भारतीय संत परंपरा सदैव कहती आई है कि
ईश्वर केवल शब्दों से नहीं,
बल्कि सच्चे भाव, श्रद्धा और निष्कपट प्रेम से प्राप्त होते हैं।
यदि मनुष्य का मन अहंकार, क्रोध, छल, ईर्ष्या और स्वार्थ से भरा हो,
तो केवल नाम जप लेने से आत्मिक परिवर्तन नहीं होता।
भक्ति तब सार्थक होती है,
जब भगवान का नाम हमारे विचार, व्यवहार और चरित्र में उतरने लगे।
आधुनिक जीवन में इस पंक्ति का महत्व
आज सोशल मीडिया और दिखावे के युग में
धर्म भी कई बार केवल प्रदर्शन बनकर रह गया है।
लोग धार्मिक बातें तो करते हैं,
लेकिन छोटी-सी बात पर क्रोधित हो जाते हैं,
दूसरों को अपमानित करते हैं और स्वार्थ में डूबे रहते हैं।
ऐसी स्थिति में यह पंक्ति हमें आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित करती है कि —
क्या हमारी भक्ति केवल शब्दों तक सीमित है?
या वास्तव में हमारे भीतर ईश्वर के गुण उतर रहे हैं?
संतों का संदेश
संत कबीर, रहीम, तुलसीदास और अन्य भक्त कवियों ने बार-बार कहा है कि
सच्ची भक्ति का प्रमाण मनुष्य का व्यवहार होता है।
यदि किसी के भीतर प्रेम, दया, सहनशीलता और विनम्रता बढ़ रही है,
तो समझना चाहिए कि उसका ईश्वर से संबंध गहरा हो रहा है।
लेकिन यदि पूजा के बाद भी मन में घृणा, अहंकार और द्वेष बना रहे,
तो वह केवल “सुवा” की तरह शब्द दोहरा रहा है।
नैतिक संदेश
यह पंक्ति हमें सिखाती है कि —
केवल भगवान का नाम लेना पर्याप्त नहीं है।
भक्ति को जीवन और व्यवहार में उतारना आवश्यक है।
बिना भाव और समझ के किया गया जप केवल शब्द बनकर रह जाता है।
सच्ची भक्ति मनुष्य के स्वभाव को बदल देती है।
निष्कर्ष
“नर के साथ सुवा हरि बोले, हरि प्रताप न जाने”
यह पंक्ति हमें भीतर झांकने की प्रेरणा देती है।
यह बताती है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल बोलना नहीं,
बल्कि ईश्वर के गुणों को अपने जीवन में उतारना है।
क्योंकि —
“जिस भक्ति से मन निर्मल न हो,
वह केवल शब्दों का शोर बनकर रह जाती है।”

#कबीर #हरिॐ #मोटिवेशन

“The parrot speaks the name of God among humans, yet it knows nothing of His divine greatness.”This line carries a deep ...
18/05/2026

“The parrot speaks the name of God among humans, yet it knows nothing of His divine greatness.”
This line carries a deep spiritual and philosophical meaning.
It is not merely talking about a parrot repeating God’s name, but about the difference between speaking spiritual words and truly understanding or experiencing them.
Simple Meaning
A parrot can easily repeat words like “Hari,” “Ram,” or other sacred names,
but it does not understand their meaning, power, or divinity.
In the same way, many people also speak about God, pray, chant, attend religious gatherings, or repeat holy words,
yet they may never truly experience devotion, humility, or spiritual transformation within themselves.
The message is clear:
Simply saying sacred words is not enough —
one must understand and live their true essence.
Deeper Explanation
This verse reveals an important truth about human life and spirituality.
Today, many people speak about religion, quote scriptures, perform rituals, and publicly express devotion.
But if kindness, compassion, honesty, humility, and love are missing from their behavior,
then their worship becomes no different from a parrot repeating learned words.
Just as the parrot says “Hari” without knowing the greatness of God,
a person who practices devotion only outwardly may also fail to understand the true power and presence of the Divine.
Devotion Requires Feeling, Not Just Words
Indian spiritual traditions have always taught that God is not reached through empty words alone,
but through sincerity, pure intention, faith, and love.
If the mind remains filled with ego, anger, jealousy, selfishness, and hatred,
then repeating God’s name mechanically cannot bring inner transformation.
True devotion begins when spiritual values become part of one’s thoughts, actions, and character.
Relevance in Modern Life
In today’s world of social media and public image,
even spirituality is sometimes reduced to performance and appearance.
People may post religious quotes, speak about morality, or appear spiritual in public,
yet lose patience, spread negativity, or hurt others in daily life.
This verse encourages self-reflection:
Are we truly living spiritual values,
or are we only repeating words without understanding them?
The Message of the Saints
Saints like Kabir, Rahim, and Tulsidas repeatedly taught that the real proof of devotion is one’s behavior.
If love, compassion, patience, humility, and truthfulness are growing within a person,
then their connection with the Divine is becoming genuine.
But if hatred, ego, and cruelty remain even after worship,
then devotion has stayed only on the lips — not in the heart.
Moral Lesson
This verse teaches us that:
Merely repeating God’s name is not enough.
Spirituality must reflect in character and behavior.
Worship without understanding becomes empty repetition.
True devotion transforms a person from within.
Conclusion
“The parrot speaks the name of God, yet knows nothing of His greatness”
is a reminder to look within ourselves.
The purpose of spirituality is not only to speak holy words,
but to embody divine qualities in everyday life.
Because:
“Devotion that does not purify the heart
becomes nothing more than noise made of sacred words.”

 #दोहे की  #व्याख्या “कह रहीम कैसे निभे, केर बेर के संग ।वे डोलत रस आपणे, उनके फाटत अंग ।।”यह दोहा महान कवि और नीति-ज्ञा...
18/05/2026

#दोहे की #व्याख्या
“कह रहीम कैसे निभे, केर बेर के संग ।
वे डोलत रस आपणे, उनके फाटत अंग ।।”

यह दोहा महान कवि और नीति-ज्ञानी अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना की गहरी जीवन-दृष्टि को प्रकट करता है।
रहीमदास ने बहुत सरल शब्दों में मनुष्य के स्वभाव, संगति और संबंधों की वास्तविकता को समझाया है।

दोहे का सरल अर्थ :-
रहीमदास कहते हैं कि
केले (केर) और बेर का साथ कैसे निभ सकता है?
क्योंकि केला स्वभाव से बहुत कोमल होता है,
जबकि बेर के पेड़ में कांटे होते हैं।
जब हवा चलती है, तो केला अपनी मस्ती में लहराता है,
लेकिन उसी दौरान बेर के कांटे केले के पत्तों और तने को फाड़ देते हैं।
अर्थात —
दो विपरीत स्वभाव वाले लोगों का साथ अधिक समय तक सुखपूर्वक नहीं चल सकता।

दोहे की गहरी व्याख्या :-
यह दोहा केवल पेड़-पौधों की बात नहीं करता,
बल्कि मानव जीवन के संबंधों और संगति का गहरा सत्य बताता है।
दुनिया में कुछ लोग सरल, विनम्र और भावुक होते हैं।
वे दूसरों का सम्मान करते हैं, प्रेम से रहते हैं और किसी को दुख नहीं देना चाहते।
वहीं कुछ लोग कठोर स्वभाव, अहंकार, क्रोध या स्वार्थ से भरे होते हैं।
ऐसे लोगों के साथ रहने पर सज्जन व्यक्ति को बार-बार चोट पहुंचती है।
जिस प्रकार बेर के कांटे केले को नुकसान पहुंचाते हैं,
उसी प्रकार बुरी संगति, कठोर व्यवहार और स्वार्थी लोग धीरे-धीरे अच्छे व्यक्ति के मन, सम्मान और शांति को घायल कर देते हैं।
संगति का प्रभाव
भारतीय संस्कृति में सदैव कहा गया है —
“जैसी संगति, वैसी रंगति।”
मनुष्य अपने वातावरण और संगति से बहुत प्रभावित होता है।
यदि कोई व्यक्ति हमेशा क्रोधी, नकारात्मक और स्वार्थी लोगों के बीच रहेगा,
तो उसका मन भी अशांत होने लगेगा।
इसके विपरीत,
अच्छे लोगों का साथ जीवन में शांति, ज्ञान और संतुलन लाता है।
रहीमदास इसी सत्य को अत्यंत सुंदर उदाहरण से समझाते हैं कि
हर संबंध केवल प्रेम से नहीं निभता,
बल्कि स्वभाव का मेल भी आवश्यक होता है।

आधुनिक जीवन में इस दोहे की प्रासंगिकता :-
आज के समय में यह दोहा और भी अधिक सत्य प्रतीत होता है।
कई लोग केवल दिखावे, लाभ या मजबूरी में ऐसे संबंध निभाते रहते हैं,
जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिलता।
धीरे-धीरे वे मानसिक तनाव, दुख और आत्मसम्मान की पीड़ा महसूस करने लगते हैं।
सोशल मीडिया और आधुनिक जीवन में भी हम अक्सर देखते हैं कि
नकारात्मक सोच वाले लोग दूसरों की सरलता का लाभ उठाते हैं।
ऐसे संबंध बाहर से सामान्य दिखते हैं,
लेकिन भीतर से व्यक्ति टूटने लगता है।
रहीमदास का यह दोहा हमें सावधान करता है कि
संबंध बनाते समय केवल निकटता नहीं,
बल्कि स्वभाव, विचार और संस्कारों का मेल भी देखना चाहिए।

दोहे का नैतिक संदेश :-
यह दोहा हमें सिखाता है कि —
हर व्यक्ति के साथ गहरा संबंध निभाना संभव नहीं होता।
गलत संगति सज्जन व्यक्ति को भी दुख देती है।
संबंधों में स्वभाव और विचारों का संतुलन आवश्यक है।
कोमल और अच्छे लोगों को अपनी मर्यादा और आत्मसम्मान की रक्षा करनी चाहिए।

निष्कर्ष :-
रहीमदास ने इस छोटे से दोहे में जीवन का बहुत बड़ा सत्य छिपाया है।
उन्होंने प्रकृति के माध्यम से समझाया कि
जहाँ स्वभाव में अत्यधिक भिन्नता हो,
वहाँ संबंध अक्सर पीड़ा का कारण बन जाते हैं।
इसलिए जीवन में ऐसे लोगों का साथ चुनना चाहिए
जो हमारे मन को शांति दें, सम्मान दें और हमारे व्यक्तित्व को बेहतर बनाएं।
“अच्छी संगति जीवन को ऊँचा उठाती है,
और गलत संगति धीरे-धीरे भीतर से तोड़ देती है।”

“कह रहीम कैसे निभे, केर बेर के संग ।वे डोलत रस आपणे, उनके फाटत अंग ।।”यह दोहा महान कवि और नीति-ज्ञानी अब्दुर्रहीम ख़ान-ए...
16/05/2026

“कह रहीम कैसे निभे, केर बेर के संग ।
वे डोलत रस आपणे, उनके फाटत अंग ।।”

यह दोहा महान कवि और नीति-ज्ञानी अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना की गहरी जीवन-दृष्टि को प्रकट करता है।
रहीमदास ने बहुत सरल शब्दों में मनुष्य के स्वभाव, संगति और संबंधों की वास्तविकता को समझाया है।

रहीमदास कहते हैं कि
केले (केर) और बेर का साथ कैसे निभ सकता है?
क्योंकि केला स्वभाव से बहुत कोमल होता है,
जबकि बेर के पेड़ में कांटे होते हैं।
जब हवा चलती है, तो केला अपनी मस्ती में लहराता है,
लेकिन उसी दौरान बेर के कांटे केले के पत्तों और तने को फाड़ देते हैं।
अर्थात —
दो विपरीत स्वभाव वाले लोगों का साथ अधिक समय तक सुखपूर्वक नहीं चल सकता।

दोहे की गहरी व्याख्या
यह दोहा केवल पेड़-पौधों की बात नहीं करता,
बल्कि मानव जीवन के संबंधों और संगति का गहरा सत्य बताता है।
दुनिया में कुछ लोग सरल, विनम्र और भावुक होते हैं।
वे दूसरों का सम्मान करते हैं, प्रेम से रहते हैं और किसी को दुख नहीं देना चाहते।
वहीं कुछ लोग कठोर स्वभाव, अहंकार, क्रोध या स्वार्थ से भरे होते हैं।
ऐसे लोगों के साथ रहने पर सज्जन व्यक्ति को बार-बार चोट पहुंचती है।
जिस प्रकार बेर के कांटे केले को नुकसान पहुंचाते हैं,
उसी प्रकार बुरी संगति, कठोर व्यवहार और स्वार्थी लोग धीरे-धीरे अच्छे व्यक्ति के मन, सम्मान और शांति को घायल कर देते हैं।

संगति का प्रभाव
भारतीय संस्कृति में सदैव कहा गया है —
“जैसी संगति, वैसी रंगति।”
मनुष्य अपने वातावरण और संगति से बहुत प्रभावित होता है।
यदि कोई व्यक्ति हमेशा क्रोधी, नकारात्मक और स्वार्थी लोगों के बीच रहेगा,
तो उसका मन भी अशांत होने लगेगा।
इसके विपरीत,
अच्छे लोगों का साथ जीवन में शांति, ज्ञान और संतुलन लाता है।
रहीमदास इसी सत्य को अत्यंत सुंदर उदाहरण से समझाते हैं कि
हर संबंध केवल प्रेम से नहीं निभता,
बल्कि स्वभाव का मेल भी आवश्यक होता है।
आधुनिक जीवन में इस दोहे की प्रासंगिकता
आज के समय में यह दोहा और भी अधिक सत्य प्रतीत होता है।
कई लोग केवल दिखावे, लाभ या मजबूरी में ऐसे संबंध निभाते रहते हैं,
जहाँ उन्हें सम्मान नहीं मिलता।
धीरे-धीरे वे मानसिक तनाव, दुख और आत्मसम्मान की पीड़ा महसूस करने लगते हैं।
सोशल मीडिया और आधुनिक जीवन में भी हम अक्सर देखते हैं कि
नकारात्मक सोच वाले लोग दूसरों की सरलता का लाभ उठाते हैं।
ऐसे संबंध बाहर से सामान्य दिखते हैं,
लेकिन भीतर से व्यक्ति टूटने लगता है।
रहीमदास का यह दोहा हमें सावधान करता है कि
संबंध बनाते समय केवल निकटता नहीं,
बल्कि स्वभाव, विचार और संस्कारों का मेल भी देखना चाहिए।
दोहे का नैतिक संदेश
यह दोहा हमें सिखाता है कि —
हर व्यक्ति के साथ गहरा संबंध निभाना संभव नहीं होता।
गलत संगति सज्जन व्यक्ति को भी दुख देती है।
संबंधों में स्वभाव और विचारों का संतुलन आवश्यक है।
कोमल और अच्छे लोगों को अपनी मर्यादा और आत्मसम्मान की रक्षा करनी चाहिए।

निष्कर्ष
रहीमदास ने इस छोटे से दोहे में जीवन का बहुत बड़ा सत्य छिपाया है।
उन्होंने प्रकृति के माध्यम से समझाया कि
जहाँ स्वभाव में अत्यधिक भिन्नता हो,
वहाँ संबंध अक्सर पीड़ा का कारण बन जाते हैं।
इसलिए जीवन में ऐसे लोगों का साथ चुनना चाहिए
जो हमारे मन को शांति दें, सम्मान दें और हमारे व्यक्तित्व को बेहतर बनाएं।
“अच्छी संगति जीवन को ऊँचा उठाती है,
और गलत संगति धीरे-धीरे भीतर से तोड़ देती है।”
#दोहा

बुराई का प्रभाव जल्दी क्यों होता है?बुराई का आकर्षण अक्सर तेज़ होता है, क्योंकि वह इंसान की इच्छाओं, कमजोरियों और तात्का...
16/05/2026

बुराई का प्रभाव जल्दी क्यों होता है?
बुराई का आकर्षण अक्सर तेज़ होता है, क्योंकि वह इंसान की इच्छाओं, कमजोरियों और तात्कालिक सुख को सीधे छूती है।
जबकि अच्छाई धैर्य, अनुशासन, त्याग और समय मांगती है।
एक बीज को वृक्ष बनने में वर्षों लग जाते हैं,
लेकिन सूखी घास में आग लगने में केवल कुछ पल लगते हैं।
ठीक इसी तरह अच्छाई धीरे-धीरे जीवन बनाती है,
और बुराई बहुत जल्दी विनाश फैला देती है।
झूठ तुरंत लोगों का ध्यान खींच लेता है,
लेकिन सत्य को स्वीकार होने में समय लगता है।
क्रोध कुछ सेकंड में रिश्ते तोड़ देता है,
जबकि प्रेम और विश्वास बनाने में वर्षों लग जाते हैं।
आज सोशल मीडिया पर भी यही दिखाई देता है।
नकारात्मक बातें, विवाद, अपमान और गलत चीजें तेजी से फैलती हैं,
क्योंकि मनुष्य का मन आकर्षण, मनोरंजन और उत्तेजना की तरफ जल्दी भागता है।
वहीं ज्ञान, चरित्र और संस्कार जैसी बातें कम लोगों को तुरंत प्रभावित करती हैं।
धर्मग्रंथों में भी कहा गया है कि मन और इंद्रियाँ स्वभाव से चंचल होती हैं।
यदि उन्हें नियंत्रण न मिले, तो वे आसानी से बुराई की ओर झुक जाती हैं।
इसीलिए साधना, सत्संग, अच्छे विचार और आत्मसंयम को जीवन में आवश्यक माना गया है।
बुराई आसान रास्ता दिखाती है,
लेकिन उसका अंत अक्सर दुख, अशांति और पछतावे में होता है।
वहीं अच्छाई का मार्ग कठिन जरूर लगता है,
पर अंत में वही सम्मान, शांति और स्थायी सुख देता है।
रावण के पास शक्ति थी, ज्ञान था, वैभव था —
फिर भी एक बुरे विचार ने उसके पूरे साम्राज्य को नष्ट कर दिया।
दुर्योधन के पास सब कुछ था,
लेकिन ईर्ष्या और अहंकार ने उसे विनाश तक पहुंचा दिया।
इतिहास और जीवन दोनों यही सिखाते हैं कि
बुराई का प्रभाव भले ही तेज़ हो,
लेकिन उसकी उम्र छोटी होती है।
अच्छाई धीमी जरूर चलती है,
पर अंत में वही स्थायी विजय प्राप्त करती है।
इसलिए जीवन में केवल यह मत देखिए कि क्या जल्दी मिल रहा है,
बल्कि यह देखिए कि क्या सही है।
“बुराई तेज़ी से फैल सकती है,
लेकिन अच्छाई ही दुनिया को टिकाए रखती है।”

15/05/2026

When you free
Speak RADHE RADHE

15/05/2026

प्रतिदिन सुबह सुबह सैकड़ों मोटरसाइकिल ऑनलाइन स्टोर से निकलती हैं और सारा दिन दौड़ दौड़कर घर-घर सामान पहुंचाते हैं ।प्रश्न य...
15/05/2026

प्रतिदिन सुबह सुबह सैकड़ों मोटरसाइकिल ऑनलाइन स्टोर से निकलती हैं और सारा दिन दौड़ दौड़कर घर-घर सामान पहुंचाते हैं ।
प्रश्न यह है कि क्या इसके चलते हमारे स्थानीय बाजार बंद तो नहीं हो जाएंगे ?
यह सोचने का विषय है ।

आज ऑनलाइन शॉपिग, मॉल्स और दिखावे के जमाने में लोग स्थानीय और छोटे दुकानों पर जाते ही नहीं, वह दुकानदार कभी कभी दिनभर बोहनी के लिए भी तरस जाता है । जरा सोचिए ! इस प्रकार वो परिवार कैसे चलेंगे ।

जब स्थानीय बाज़ार सूने हो जाते हैं,
तो सिर्फ दुकानें बंद नहीं होतीं…
बल्कि कई परिवारों के सपने, मेहनत और उम्मीदें भी धीरे-धीरे बुझने लगती हैं।
हर छोटी दुकान के पीछे किसी पिता की जिम्मेदारी,
किसी माँ का त्याग और किसी बच्चे का भविष्य जुड़ा होता है।
अगर हम आज अपने स्थानीय व्यापारियों का साथ देंगे,
तो कल हमारा शहर, हमारी पहचान और हमारी संस्कृति ज़िंदा रहेगी।
“स्थानीय खरीदें… क्योंकि बाज़ार सिर्फ व्यापार नहीं,
हमारे समाज की धड़कन हैं।”

Address

निकट शिव मंदिर, सैदवारा, रानी की सराय, आजमगढ़
Azamgarh
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