28/05/2026
शादी में शगुन प्रथा : एक सामाजिक असमानता की जड़
भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन माना जाता है। हमारी संस्कृति में शादी-ब्याह के अवसर पर रिश्तेदारों और परिचितों द्वारा “शगुन” देने की परंपरा बहुत पुरानी है। मूल रूप से इसका उद्देश्य नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद और सहयोग देना था। लेकिन समय के साथ यह परंपरा अपनी मर्यादा और उद्देश्य से भटक गई। आज शगुन प्रेम और शुभकामना से अधिक दिखावे, सामाजिक दबाव और आर्थिक बोझ का माध्यम बन चुकी है। इसलिए अब समय आ गया है कि इस प्रथा पर गंभीर विचार किया जाए और इसे समाप्त अथवा पूरी तरह समानता आधारित बनाया जाए।
पहले के समय में लोग सामर्थ्य अनुसार थोड़ा-बहुत अनाज, कपड़ा या धन देकर सहायता करते थे। उसमें न कोई प्रतिस्पर्धा थी और न ही अहंकार। लेकिन आज शगुन एक प्रकार का “लेन-देन का हिसाब” बन गया है। लोग यह देखने लगे हैं कि किसने कितने रुपये दिए, किसने कम दिए और किसने ज्यादा। कई परिवार तो बाकायदा डायरी में लिखते हैं कि किस व्यक्ति ने कितना शगुन दिया ताकि भविष्य में उतना ही लौटाया जा सके। इस सोच ने रिश्तों की आत्मीयता को कमजोर कर दिया है।
इस प्रथा का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है। जिन लोगों की आय सीमित होती है, वे शादी का निमंत्रण मिलने पर खुशी से अधिक चिंता महसूस करते हैं। वे सोचने लगते हैं कि “अगर कम शगुन दिया तो लोग क्या कहेंगे?” इसी कारण कई लोग शादी में जाने से कतराते हैं। कुछ लोग उधार लेकर या अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके शगुन देते हैं ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। यह स्थिति अत्यंत दुखद है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए किसी मजदूर या छोटे कर्मचारी को एक महीने में तीन-चार शादियों का निमंत्रण मिल जाता है। उसका मासिक वेतन मुश्किल से घर चलाने लायक होता है, फिर भी उसे प्रत्येक शादी में हजारों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यदि वह कम राशि देता है तो उसे शर्मिंदगी महसूस होती है। दूसरी ओर, संपन्न लोग बड़े-बड़े शगुन देकर अपने धन का प्रदर्शन करते हैं और कहीं न कहीं उनके भीतर घमंड की भावना भी उत्पन्न होती है। इस प्रकार शगुन की परंपरा सामाजिक असमानता और मानसिक दबाव को बढ़ाती है।
शगुन प्रथा का एक और नकारात्मक पक्ष यह है कि इससे रिश्तों में स्वार्थ प्रवेश कर जाता है। कई बार लोग निमंत्रण इस भावना से देते हैं कि “उन्होंने हमारे यहाँ इतना दिया था, इसलिए इन्हें बुलाना जरूरी है।” रिश्ते प्रेम और अपनत्व के बजाय पैसों के आदान-प्रदान तक सीमित होने लगते हैं। विवाह जैसे पवित्र संस्कार का उद्देश्य आनंद और आशीर्वाद होना चाहिए, न कि आर्थिक तुलना।
समाज में समरसता बनाए रखने के लिए इस प्रथा को समाप्त करना अत्यंत आवश्यक है। विवाह में केवल आशीर्वाद और शुभकामनाओं को महत्व मिलना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से सहयोग करना भी चाहता है, तो वह बिना दिखावे और बिना सामाजिक दबाव के करे। सबसे अच्छा उपाय यह हो सकता है कि शादी में शगुन लेने-देने की परंपरा पूरी तरह बंद कर दी जाए। यदि समाज इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकता, तो कम से कम एक समान प्रतीकात्मक शगुन की व्यवस्था होनी चाहिए, जैसे सभी लोग केवल 11 रुपये, 21 रुपये या एक फूल देकर आशीर्वाद दें। इससे अमीर और गरीब के बीच भेदभाव समाप्त होगा और किसी को शर्मिंदगी महसूस नहीं होगी।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम परंपराओं को आँख बंद करके न अपनाएँ, बल्कि यह देखें कि वे समाज के लिए उपयोगी हैं या हानिकारक। जो परंपरा लोगों में हीन भावना, दिखावा, घमंड और आर्थिक बोझ पैदा करे, उसे बदल देना ही उचित है। सच्चे रिश्ते पैसों से नहीं, बल्कि सम्मान, प्रेम और सहयोग से मजबूत होते हैं।
अंततः यही कहा जा सकता है कि शादी में शगुन की वर्तमान प्रथा समाज में असमानता और मानसिक दबाव को बढ़ावा देती है। इसलिए इसे समाप्त कर देना चाहिए या फिर पूरी तरह समानता आधारित बना देना चाहिए ताकि हर व्यक्ति बिना डर, शर्म और दबाव के विवाह समारोह में सम्मिलित हो सके और समाज में वास्तविक समरसता स्थापित हो सके।
साभार
यह भी जानिए / knowledge